केरल के मुन्नार में हमारा हनीमून- बाढ़ में जैसे मृत्यु नाच रही थी

मैं और हाना अपने प्रेम को विवाह का नाम दे चुके थे. शादी के बाद हमारी तमन्ना थी कि हम केरल और मुन्नार (Munnar) की वादियों में कुछ दिन बिताएं. इसके लिए मैंने शादी से कई महीने पहले से तैयारी शुरू कर दी थी. बात 25 नवंबर 2015 की है. शादी के बाद मैं और हाना इसी दिन हनीमून के लिए दिल्ली से केरल निकले थे. दिल्ली के एयरपोर्ट से उड़ान भरने के लिए बाद फ्लाइट सीधा केरल के कोच्चि पहुंची. कोच्चि से हमें उस ट्रैवल एजेंसी का साथ मिल गया था जिससे हमने बुकिंग कराई थी. वहां टूर गाइड, ड्राइवर ने हमें पिक किया और सीधा हम मुन्नार के लिए निकल गए. कोच्चि में हमें थोड़ी भीड़ नजर आई लेकिन कोच्चि शहर को पीछे छोड़ते ही जैसे सड़के और हरी भरी वादियां मुझे और हाना का स्वागत बाहें फैलाए कर रही थी. हमें चारों तरह हरे भरे पेड़ दिखाई दे रहे थे. रबड़ और केले के पेड़ मुझे बेहद अधिक संख्या में दिखाए दिए.

पढ़ें- लद्दाख का सफरः जब हमें मौत के मुंह से खींच लाया ITBP का एक जांबाज!

केरल में मुझे सड़के थोड़ी संकरी नजर आ रही थी. चूंकि वह वनवे थी इसलिए एक ही रोड पर दोनों तरफ का ट्रैफिक था. शायद दिल्ली की चौड़ी सड़कें मेरे दिमाग में बसी हुई थी. हालांकि इसपर भी केरल की वादियों और खूबसूरती का कोई मुकाबला नहीं. देखते ही देखते हम मुन्नार की तरफ पहाड़ी पर चलने लगे थे. मेरे दिमाग में 70 के दशक की फिल्मों के गीत बजने शुरू हो गए थे. मैंने यहां ड्राइवर से कहा कि क्या वह कोई संगीत चला सकता है. ड्राइवर ने हिंदी कम समझी लेकिन मेरे कहते ही उसने हिंदी फिल्मों के गाने चलाने शुरू कर दिए.

मुन्नार अमूमन केरल के ठंडे जिलों में आता है लेकिन चूंकि मैं और हाना दोनों ही उत्तराखंड के थे इसलिए हमें वहां ठंड का अहसास नहीं हो रहा था. हम दोनों ही उत्तराखंड में पिथौरागढ़ से हैं. हमें अपने टूर में मुन्नार की ह्युमिडीटी का असर दिखाई दिया. वहां के मौसम में हमें पसीना बहुत आ रहा था. रास्ते में हमें एक झरना मिला जहां लोग फोटो खिंचवा रहे थे. हम वहां रुके और हमने भी दूसरे पर्यटकों की तरह वहां फोटो खिंचवाई और नारियल पानी पिया. मैंने इसके बाद झरने के पानी को हाथ लगाया तो हैरत में पड़ गया. वहां झरने का पानी एकदम गर्म था. आमतौर पर उत्तराखंड में ऐसा नहीं होता है. वहां पानी बेहद ठंडा होता है. ये अनुभव भी मेरे लिए पहला था.

मुन्नार में हमने तीन दिन बिताए. हमारा ठिकाना यहां पर एक ट्री हाउस में था. ये पेड़ पर बना एक घर था. हम यहां से एलिपि के लिए निकले. एलिपि हाउसबोट के लिए मशबूर जगह है. नाव में पूरा घर बना होता है. यहां 3 लोग आपकी खिदमत के लिए होते हैं. अगले दिन हम यहां से कोवलम के लिए निकल गए. कोवलम लाइट हाउस बीच कहा जाता है. हमारे ये दो दिन भी बेहद खूबसूरत थे. हम समंदर किनारे थे. यहां बेहद शानदार रेस्ट्रो बार थे. सर्फिंग के लिए विदेशों से बड़ी संख्या में लोग आते हैं. सर्फिंग को मैंने भी ट्राइ किया लेकिन कामयाबी नहीं मिली. कोवलम से हमें दिल्ली के लिए निकलना था लेकिन हमारी फ्लाइट जो एयर इंडिया की थी वह चेन्नई से कनेक्टिंग थी. फ्लाइट को कोवलम से उड़ना था और उसे चेन्नई में रुकना था. वहां से फ्लाइट पैसेंजर्स को लेकर दिल्ली के लिए निकलती.

कोवलम से हम दिल्ली के लिए निकले. जैसे ही हमारा प्लेन चेन्नई के आसमान में पहुंचा भारी बारिश से हमारा सामना हुआ. मैंने कई बार प्लेन में सफर किया है लेकिन प्लेन का वो सफर आज भी मैं अपने जहन से नहीं निकाल सका हूं. तेज बारिश के साथ साथ बिजली जोर जोर से कड़क रही थी. इसके असर से हमारा प्लेन कभी ऊपर जाता तो कभी नीचे की ओर गिरता. प्लेन में इन भयानक झटकों ने पैसेंजर्स को परेशान कर दिया था. सभी सहम गए थे. मूसलाधार बारिश हो रही थी. ऐसा सीन मैंने अभी तक हॉलीवुड फिल्मों में ही देखा था. पहली बार वो सीन मैं खुद अनुभव कर रहा था. बारिश इतनी तेज थी कि हमारे प्लेन को लेंडिंग की इजाजत नहीं मिल सकी. रनवे पर काफी पानी था, प्लेन फिसल सकता था इसलिए इजाजत नहीं मिली. प्लेन हवा में ही चक्कर लगा रहा था. आखिरकार बारिश थोड़ी कम हुई और प्लेन को लैंडिंग की इजाजत मिली. सभी यात्री घबराए हुए थे लेकिन प्लेन ने सेफली लैंड कर लिया.

पैसेंजर्स प्लेन से निकले ही थे कि मूसलाधार बारिश फिर शुरू हो गई. हम एयरपोर्ट में गए और अपनी दूसरी फ्लाइट का इंतजार करने लगे जो आधे घंटे बाद ही थी. हम इंतजार कर ही रहे थे कि प्लेन की जानकारी के लिए लगाए गए डिस्प्ले बोर्ड पर हमें पहली फ्लाइट कैंसल दिखी. फिर सारी फ्लाइट कैंसल दिखने लगी. हमें अजीब सा अनुभव होने लगा, जो शायद कोई डर ही था. हम एयर इंडिया के स्टाफ के साथ ही थी. हमारे साथ और भी कई पैसेंजर्स थे. हम चिंता में डूबे हुए थे. मेरे साथ ये पहला अनुभव था. हमें रात भर एक घंटे, दो घंटे कहकर फ्लाइट का इंतजार कराया गया. हम एयरपोर्ट पर ही रहे जबकि दूसरी एयरलाइंस के पैसेंजर्स के लिए होटल में रुकने का इंतजाम किया गया. एयर इंडिया ने हमारे लिए खाने की व्यवस्था भी नहीं की.

एयरपोर्ट पर सुईट में भी किसी तरह की व्यवस्था नहीं थी जबकि दूसरी एयरलाइन ने ये व्यवस्था कर रखी थी. हम सुईट में खुद ही घुस गए और मैं वहां से अपने और हाना के लिए खाना लेकर आ गया. दूसरे पैसेंजर्स ने भी ऐसा किया. हालांकि एयर इंडिया कर्मियों ने इसका विरोध किया लेकिन कोई नहीं रुका. इसके बाद सुबह 5 बजे मेरी नींद खुली. हाना एक बेंच पर लेटी हुई थी और मैं चेयर पर ही था. मैंने हाना से कहा कि तुम सामान का ध्यान रखो मैं प्लेन का पता करके आता हूं. इसके बाद मैं ऊपर गया जहां से रनवे का एक हिस्सा भी दिखाई देता है. मैं वहां जाकर हैरान रह गया. वो रनवे नहीं था बल्कि विशाल झील बन चुकी थी और प्लेन किसी बवंडर में फंसी नाव की तरह तैर रहे थे. चार्टर्ड प्लेन तो किसी कागज की नाव जैसे हो चुके थे. मुझे ये देखकर यकीन हो गया अब ये रनवे बंद हो चुका है. यहां दिक्कत होने वाली है. मैं बिल्कुल परेशान हो गया.

अब मुझे एयरपोर्ट प्रशासन और एयर इंडिया का कतई भरोसा नहीं रह गया था. इसके बाद मैंने दिल्ली में अपने दफ्तर में संपर्क किया. वहां से संपर्क करके कुछ मीडियाकर्मी एयरपोर्ट पहुंचे और मैंने उन्हें अपनी बाइट थी. समाचार एजेंसी एएनआई भी इनमें थी. कुछ ही घंटे में इसका असर दिखाई दिया. हमें सूचना मिली कि एयरफोर्स के हेलिकॉप्टर से हमें नजदीक के एयरफोर्स स्टेशन ले जाया जाएगा और वहां से दिल्ली. ये खबर सुनकर मैंने और हाना दोनों ने राहत ली. इसके चंद मिनटों बाद ही एयरफोर्स के नौजवान अफसर हमारे सामने थे. अफसर बिल्कुल जेंटलमैन लग रहे थे. उन्होंने हमारा वेलकम किया और हेलिकॉप्टर तक लेकर गए. हेलिकॉप्टर में जगह कम थी और लोग ज्यादा. ये देखकर मैं फिर परेशान हो गया. एयरफोर्स के अफसरों ने कहा कि वह पहले बुजुर्गों और बच्चों-महिलाओं को लेकर जाएंगे और बाद में

ये सुनकर मुझे लगा कि संकट फिर आ गया. मैंने एयरफोर्स के अफसरों से रिक्वेस्ट किया और कहा कि हम दो ही लोग हैं और किसी तरह अडजस्ट कर लेंगे. एयरफोर्स के अफसर भी बेहद को-ऑपरेटिव थे. उन्होंने मुझे हाना के साथ जाने की इजाजत दे दी. हम एयरबेस पहुंचे और वहां से स्पेशल प्लेन से दिल्ली. दिल्ली लैंडिंग से पहले मैं प्लेन की खिड़की से इमारतों को देख रहा था. मन में ख्याल आया कि ये मकान, इमारतें और इंसान के बनाए विमान जब कुछ कुदरत के आगे बेबस हैं. मैंने ईश्वर से प्रार्थना की कि वह मनुष्यों को बचाए नहीं बल्कि सद्बुद्धि दे कि वह कुदरत के साथ वैसा बर्ताव न करें जो चेन्नई में बीते कई सालों में हुआ है.

(ये ब्लॉग हमने खेल पत्रकार अनूप देव सिंह से बातचीत के आधार पर तैयार किया है. हमारे साथ ऐसे कई ट्रैवलर्स जुड़े हैं जो अपने अनुभवों को वक्त वक्त पर हमसे साझा करते हैं और हम उन्हें अपनी बात कहने के लिए मंच प्रदान करते हैं. इसके बदले में किसी भी ब्लॉगर को किसी तरह का भुगतान नहीं किया जाता है. अगर आप भी ट्रैवल जुनून से इसी तरह जुड़ना चाहते हैं तो हमें लिखें- emailpreeti18@gmail.com)

News Reporter

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: